क्या है ये फॉरेंसिक लेखांकन ?

न्यायप्रविष्ट मामलोंमें किया जाने वाला सबुतोंका विवेचन फॉरेंसिक लेखांकन या फॉरेंसिक एकाउंटिंग कहा जाता है | १९४० में अमेरिका में मोरिस पोलुबेटने सबसे पाहिले इस संद्या का उपयोग किया था | इसके बाद भारतमे २००३ में भारत के महान फॉरेंसिक अकाउंटेंट मयूर जोशी द्वारा इस संद्या को सुधारा गया |  फॉरेंसिक एकाउंटिंग के २ मुख्य पैलु है एक होता है संशोधनात्मक एकाउंटिंग और दूसरा होता है न्यायिक मामलोमें मदत | 

संशोधनात्मक एकाउंटिंग यह हमेशासे धोखाधड़ी या घोटालोसे जुड़ा हुआ है  | कॉर्पोरेट क्षेत्र की धोखाधड़ी के मामलोमें संशोधनात्मक एकाउंटिंग की जरुरत पड़ती है ये जानने के लिए की प्रतिस्पर्धी को कोई मेरी महत्वपूर्ण जानकारी दिए गयी है क्या, इससे कंपनी का कितना घाटा हो सकता है, ये जानकारी वापस नहीं मिले तो क़ानूनी प्रक्रिया क्या होगी, इन सब मामलो में एक अच्छा फॉरेंसिक अकाउंटेंट बहोत मदत करता है |   

एक अच्छा फॉरेंसिक अकाउंटेंट बनने के लिए एकाउंटिंग, ऑडिटिंग और संशोधनात्मक कार्य करने के अलावा टेक्नोलॉजी कुशल होने की आवश्यकता होती है |

आर्थिक धोखाधड़ी के मामलोकि जांच पड़ताल का काम फॉरेंसिक एकाउंटेंट्स द्वारा किया जाता है | अगर किसी कंपनी में कोई कर्मचारी, ग्राहक या वेंडर कोई धोखाधड़ी करते है तो उसको सुलझाने के लिए, कंपनी का नुकसान कितना हुआ ये पता करने के लिए, धोखाधड़ी की प्रकारसे किए गयी ये सब पता लगाने का काम फॉरेंसिक एकाउंटेंट्स करते है | भारत में सबसे पहले २००६ में सर्टिफाइड फॉरेंसिक फॉरेंसिक एकाउंटिंग प्रोफेशनल यह कोर्स चालू किया गया |